मैं लिखना चाहता हूँ
Mai Likhna Chahta Hoon
Sahil RazaMay 2026
मैं लिखना चाहता हूँ
सर्द रात में रज़ाई की गर्माहट की तरह,
लंबे सफ़र से लौटे हुए मुसाफ़िर की तरह
भंडारे पर आए हुए किसी भूखे की तरह,
अपनी धुन में मगन दीवाने बच्चे की तरह,
मैं लिखना चाहता हूँ
एक तपस्वी संत की कही गई सरल बात हो जैसे,
मैं वो सरल बात कहना चाहता हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ
वो बदकिस्मत पेड़ जो फल दे न दे, छाँव ज़रूर देता है
मैं वह अभागा पेड़ बनना चाहता हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ
समुद्र मंथन में देवताओं की तरह, अमृत पी कर नहीं,
मैं अपने लेखन से अमर होना चाहता हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ
अदालत में न्याय की देवी के समक्ष, गीता या कुरान पे नहीं
मैं अपनी डायरी पर हाथ रख क़सम खाना चाहता हूँ।
मैं लिखना चाहता हूँ
अपने हिस्से की मशक्कत कर, फ़ैज़, दिनकर या साहिर नहीं
मैं अपने समय का ‘साहिल’ बनना चाहता हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ