नज़रनामा
Poem · नज़्म

लक़ीर

Laqeer

Sahil RazaJune 2023

आज एक लक़ीर खींची गयी है

सियासत फिरसे खेली गयी है

किसे पता था कि ये लक़ीर कब सरहद बन जाएगी

और देखते ही देखते यहाँ गोलियाँ बरसाई जाएगी

गोलियाँ उन पर जो कभी अपने थे

किसे पता था कि इस तरह की भी सियासत खेली जाएगी

आज एक लक़ीर खींची गयी है

सियासत फिरसे खेली गयी है

आज़ादी ज़रूर मिली हमको

पर हमें अपनो से दूर हो कर

ज़रा तसव्वुर करो उन आवाज़ों को

उन चीखो को जो निकली थी बेघर हो कर

आज एक लक़ीर खींची गयी है

सियासत फिरसे खेली गयी हैx1

ये जलते हुए घर किसके है

ये कटते हुए तन किसके है

ये लहू किसका है

ग़ज़ब खेल खेला है इन सियासत के ठेकेदारों ने

हमें अपने ही घर से निकालने का ये मंसूबा किसका है

आज एक लक़ीर खींची गयी है

सियासत फिरसे खेली गयी है

आख़िर में मैं एक शेर सुनना चाहता हूँ

शेर में बस इतना कहना चाहता हूँ

की क़ुर्बान हो जाए हम जैसे कई इस मुल्क पर

मैं सिर्फ़ हिंदुस्तान को खुशहाल देखना चाहता हूँ