लक़ीर
Laqeer
आज एक लक़ीर खींची गयी है
सियासत फिरसे खेली गयी है
किसे पता था कि ये लक़ीर कब सरहद बन जाएगी
और देखते ही देखते यहाँ गोलियाँ बरसाई जाएगी
गोलियाँ उन पर जो कभी अपने थे
किसे पता था कि इस तरह की भी सियासत खेली जाएगी
आज एक लक़ीर खींची गयी है
सियासत फिरसे खेली गयी है
आज़ादी ज़रूर मिली हमको
पर हमें अपनो से दूर हो कर
ज़रा तसव्वुर करो उन आवाज़ों को
उन चीखो को जो निकली थी बेघर हो कर
आज एक लक़ीर खींची गयी है
सियासत फिरसे खेली गयी हैx1
ये जलते हुए घर किसके है
ये कटते हुए तन किसके है
ये लहू किसका है
ग़ज़ब खेल खेला है इन सियासत के ठेकेदारों ने
हमें अपने ही घर से निकालने का ये मंसूबा किसका है
आज एक लक़ीर खींची गयी है
सियासत फिरसे खेली गयी है
आख़िर में मैं एक शेर सुनना चाहता हूँ
शेर में बस इतना कहना चाहता हूँ
की क़ुर्बान हो जाए हम जैसे कई इस मुल्क पर
मैं सिर्फ़ हिंदुस्तान को खुशहाल देखना चाहता हूँ