नज़रनामा
Poem · नज़्म

दरवाज़ा

darvāzā

Sahil RazaJune 2026

हर दस्तक पे सोचा, कोई अपना होगा

हर आहट पे उठकर देखा किया

दरवाज़ा खुला ही रहा,

और मैं बंद होता चला गया

अब कोई आए तो कहना —

घर है, मगर कोई रहता नहीं

A note

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